एक याद को दफ़न करके, एक याद के साथ चला ,
यादों की टोली में,यादों की बारात चला |कहीं यादों में गुस्सा है, कहीं यादों में प्रेम भरा,
यादों की यह सिलसिले में, में यहाँ गुपचुप मौन परा ||
यादें भी अजीब हैं, ना जाने क़ब आ जाती हैं,
काम कर रहा था मैं, अब काम से मुझे बेह्कतीं हैं |
खुले दरवाजे जैसा मेरा यह बावले मन्न में,
कई भीनी हरकतओं की खेल, खेल जाती हैं ||
मुस्कुरा उठता मैं खुद में, वोह छत को देखता हुआ,
अकेला हूँ यहाँ अभी मगर , पर यादों में संसार भरा |
न उमर की शीमा इन् यादों को, कहीं भी दौड़ी चली जाती है,
बचपन से जवानी का सफ़र, मिनटों में कर आती है ||
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