होली

कोई खेले रंग की होली,
कोई खेलता खून की |
कहीं गोली तो कहीं योग है,
कहानी मेरे मात्रिभूम की ||

होलिका दहन तो चलती आई,
होली के सन्देश में |
भ्रस्टाचार को क़ब दहन करोगे,
बताओ भारत देश में ||

कोई फेहला रहा भारतीय रंग,
जाकर दूर प्रदेश में |
कोई थाली छलनी छेद कर रहा,
रहकर प्यारे देश में ||

कोई काली मिट्टी पोत रहा है,
लेकर लालची लटकती  लम्बी  जीभ |
कहीं उड़ा रहे, सतरंगी गुलाल हवा में,
खुशियाँ बिखेरते कर्मठ भारतीय वीर ||

भाँग जोश का बदन में चढ़ाव,
रंगों दुनिया को 'इंडियन' के रंग में |
है लगा धब्बा, मलमल उससे हटाओ,
ले चलना है जहाँ को संग में ||


1 टिप्पणी:

  1. होली व भ्रष्टाचार का सुन्दर विनिमय है आपकी कविता भारत की विडम्बना को परिदार्षित कर रही है
    संदीप लिखते रहो शायद कोई जग जाये

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