पतंग

पतंग उडाये आसमान में, सोच धागा  ले काटूँगा
जब आई वार पतंगों की तो, अपना ही बंधा टूट गया |

टूट गिरी  धागा निहत्ते, वोह मेरा पथ-वीर बिछर गया,
कसम ली थी साथ उड़ने की तो, मुझसे तू क्यों रूठ गया |

वोह पतंग मेरा जा रहा, न जाने किसके हाथ वोह आएगा,
बंधा था मेरी खुशियों के डोर से,अब उसे कोई और उडाएगा |

नजर उठाकर देखा आसमान में, हर तरह के पतंग वहाँ ,
कोई कटता तो कोई काट रहा, हर डोर एक संघर्ष वहाँ |

एक पतंग कट कर आया, हम जहाँ खड़े थे वहीँ,
सोचा छुपा उसे रख लूँगा, पर न उड़ना उसका कर्म नही |

नए शिरे से फिर से बाँधा, दिया हवा में उसको जोश,
धागा ले मस्त हो उड़ा, लहराता,बलखाता, खुद में मदहोश |


1 टिप्पणी:

  1. पतंग बंधी हुई थी कर्म (मआन्झे)की डोर से न रुक पायेगी न चुप पायेगी जब तक की वो कट जायेगी या काट आयेगी
    विचारों के प्रवाह के लिए धन्यवाद

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